अब तो मोहब्बत की बारी है

अब तो मोहब्बत की बारी है, इतना तकरार क्यों है? चार दिन की ज़िंदगानी है, चिंता बेशुमार क्यों है? दुनिया के भिन्न विषयों से, इतना तिरस्कार क्यों है? छोड़ों विवाद का चक्कर, तुझको यह अहंकार क्यों है? बदलते वक़्त के इन्तेहाँ में, इतना तू बेज़ार क्यों है? मुक़्कदर को थाम ले, इतना तू बे–इख़्तियार क्यों… Continue reading अब तो मोहब्बत की बारी है

औरत

उसकी ख़ामोशी है, उसकी सहमती न समझें उसका शर्माना अदा है, उसकी इजाज़त न समझें उसके आँसू हैं, उसकी रुसवाई न समझें जज़बातों का ज़रिया है, उसकी शिकायत न समझें उसकी सहनशीलता है, उसकी कमज़ोरी न समझें छुपाती है तुम्हारे सितम के राज़, उसको अबला न समझें उसका दिल दरिया है, उसको पत्थर न समझें… Continue reading औरत

तेरे आने की आहट

लहराती है हवा तो सरसराती है कभी तेरे आने की आहट दे जाती है कभी। छुप्ती है चांदनी तो जगमगाती है कभी तेरे चेहरे की रौशनी दे जाती है कभी। खिलती है कलियाँ तो शर्माती हैं कभी तेरे यादों की खुशबू दे जाती हैं कभी। छलकती है शबनम तो बेह जाती है कभी तेरे होंठों… Continue reading तेरे आने की आहट

ज़िन्दगी के चार लम्हे

    ज़िन्दगी के चार लम्हे, देखते-देखते गुज़र जायें दो पल तेरे साथ बीतें, दो पल याद में गुज़र जायें। दीवारों से प्यार नहीं, मिलके रो लेता हूँ कभी इश्क़ की कीमत अदा करते बस, उम्र गुज़र जाये। मैखाने में भरे जाम को फकत, छू लेता हूँ कभी नशे की आदत तो नहीं बस, शाम… Continue reading ज़िन्दगी के चार लम्हे

एक प्रवासी की दुविधा

बचपन यहाँ गुज़रा है सारा, चन्द लफ़्ज़ों में बयाँ कैसे करूँ लड़कपन की बिसरी यादों की अब, इनायत मैं कैसे करूँ महफ़िलें सजी, अहबाब यूँ मिलें, शुक्रिया अदा कैसे करूँ इस धड़कते सीने की रफ़्तार पर अब, इख़्तियार मैं कैसे करूँ मज़हबी तनाव में लिपटा तू अभी, अश्रू से बुझाने की कोशिश कैसे करूँ रहबरों… Continue reading एक प्रवासी की दुविधा

On “वैराग्य”(Ascetic Indifference/Dispassion/Detachment)

जीने की आरज़ू है अभी, पर जाने का भी ग़म नहीं पल पल में कट जाये ज़िन्दगी, पर उम्र भी तो कम नहीं। महफिलें सजती हैं बहुत, जाने का कोई शौक नहीं बुलायें या भूल जायें हमें, किसी पर कोई टोक नहीं। मश्वरे का मौका पड़े, अर्ज़ करने की चाह नहीं बनते-बिगड़ते मुक़द्दर को, छेड़ने… Continue reading On “वैराग्य”(Ascetic Indifference/Dispassion/Detachment)

लफ्सों में क्या इतनी ताकत?

लफ्सों में क्या इतनी ताकत? हंगामा यह बेशुमार क्यों है? दोस्तों की चंद बातों से बनती यह दरार क्यों है? दिल है अपना साफ़ तो टोकने पे तकरार क्यों है? नीयत नहीं खराब तो बेमतलब बेकरार क्यों है? केहनो दो, सुनने दो सबको अहम से इतना प्यार क्यों है? पढ़ने दो, लिखने दो सबको मान्यता का… Continue reading लफ्सों में क्या इतनी ताकत?