एक प्रवासी की दुविधा

बचपन यहाँ गुज़रा है सारा, चन्द लफ़्ज़ों में बयाँ कैसे करूँ लड़कपन की बिसरी यादों की अब, इनायत मैं कैसे करूँ महफ़िलें सजी, अहबाब यूँ मिलें, शुक्रिया अदा कैसे करूँ इस धड़कते सीने की रफ़्तार पर अब, इख़्तियार मैं कैसे करूँ मज़हबी तनाव में लिपटा तू अभी, अश्रू से बुझाने की कोशिश कैसे करूँ रहबरों… Continue reading एक प्रवासी की दुविधा

On “वैराग्य”(Ascetic Indifference/Dispassion/Detachment)

जीने की आरज़ू है अभी, पर जाने का भी ग़म नहीं पल पल में कट जाये ज़िन्दगी, पर उम्र भी तो कम नहीं। महफिलें सजती हैं बहुत, जाने का कोई शौक नहीं बुलायें या भूल जायें हमें, किसी पर कोई टोक नहीं। मश्वरे का मौका पड़े, अर्ज़ करने की चाह नहीं बनते-बिगड़ते मुक़द्दर को, छेड़ने… Continue reading On “वैराग्य”(Ascetic Indifference/Dispassion/Detachment)

लफ्सों में क्या इतनी ताकत?

लफ्सों में क्या इतनी ताकत? हंगामा यह बेशुमार क्यों है? दोस्तों की चंद बातों से बनती यह दरार क्यों है? दिल है अपना साफ़ तो टोकने पे तकरार क्यों है? नीयत नहीं खराब तो बेमतलब बेकरार क्यों है? केहनो दो, सुनने दो सबको अहम से इतना प्यार क्यों है? पढ़ने दो, लिखने दो सबको मान्यता का… Continue reading लफ्सों में क्या इतनी ताकत?

याद आते हैं कभी लड़कपन के दिन

याद आते हैं कभी लड़कपन के दिन वह दिन भर की मस्ती फिक्रों के बिन खेलना और छेड़ना सिर्फ मक़सद हमारा ‘ऐसे ही’ गुज़रते थे साल, महीने और दिन।   याद आते हैं कभी मोहब्बत के दिन वह दिन भर भटकना मंज़िल के बिन जो बिछेडे, दिल होता बेबस हमारा न कटती थी रातें, न… Continue reading याद आते हैं कभी लड़कपन के दिन

समर्पण पे दोहे

(Couplets on Surrender) तेरी ही दुनिया, तूने बुलाया, करेगा मेहमान-नवाज़ी भी तू तेरे ही दर पे कब से खड़ा हूँ, जल्दी से आकर अपना ले तु। चली हवा तो चल पड़ा, थमी हवा तो थम गया सूखे पत्ते सी हो ज़िंदगी, तेरी रज़ा में जो रम गया। ना मौजों का डर, ना किनारे की ख्वाइश,… Continue reading समर्पण पे दोहे

कुरुक्षेत्र यह तेरा है, मोदी भाई

Challenge to Modi to turn “Statesman”: हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई खाना अलग, कभी अलग पहनाई देश में रहते जैसे भाई-भाई  अब क्यों दिलों में है उदासी छाई?   उजले भविष्य की मांग है आयी तेरे प्रायश्चित की घड़ी है लायी देश के रहबर, अरे मसीहा भाई क्यों खड़ा ऐसे, क्यों चुप्पी छाई?   छोड़ दे संगत, गहरी… Continue reading कुरुक्षेत्र यह तेरा है, मोदी भाई

एक नया मसीहा आया है?

On the “so-called” promise of Modi: शासन नहीं चलायेगा वह सेवक बन के आया है मिट जाएगी सारी समस्या एक नया मसीहा आया है?   हमारी सड़कें साफ़ करेगा झाड़ू वह अपनी लाया है मिट जाएगी सारी समस्या एक नया मसीहा आया है?   रोज़गार मिलेगा सबको “मेक इन इंडिया” का चलन सिखाया है मिट… Continue reading एक नया मसीहा आया है?