औरत

उसकी ख़ामोशी है, उसकी सहमती न समझें उसका शर्माना अदा है, उसकी इजाज़त न समझें उसके आँसू हैं, उसकी रुसवाई न समझें जज़बातों का ज़रिया है, उसकी शिकायत न समझें उसकी सहनशीलता है, उसकी कमज़ोरी न समझें छुपाती है तुम्हारे सितम के राज़, उसको अबला न समझें उसका दिल दरिया है, उसको पत्थर न समझें… Continue reading औरत