एक प्रवासी की दुविधा

बचपन यहाँ गुज़रा है सारा, चन्द लफ़्ज़ों में बयाँ कैसे करूँ लड़कपन की बिसरी यादों की अब, इनायत मैं कैसे करूँ महफ़िलें सजी, अहबाब यूँ मिलें, शुक्रिया अदा कैसे करूँ इस धड़कते सीने की रफ़्तार पर अब, इख़्तियार मैं कैसे करूँ मज़हबी तनाव में लिपटा तू अभी, अश्रू से बुझाने की कोशिश कैसे करूँ रहबरों… Continue reading एक प्रवासी की दुविधा